नोटबंदी : अनजाने में हुई भूल नहीं, सोच समझकर लिया गया निर्णय था

8 नवम्बर, 2016 को 500 और एक हजार के नोट पर लाई गई पाबंदी की नीति ने पूरे भारत में मानो भूचाल सा ला दिया था। इसकी घोषणा खुद प्रधानमंत्री मोदी ने की। नोटबंदी के निर्णय को सुनाने वाली यह नीति भारतीय अर्थव्यवस्था में ही नहीं, इसकी राजनीति में भी एक बड़े बदलाव को जन्म दिया।

लंबे समय तक यह बहस होती रही कि इस निर्णय को सुनाने का अधिकार किसे है और किसे नहीं है। लेकिन, आने वाले समय में यह तय हो चुका था कि नीति-निर्णय हो या उद्घाटन सभी कुछ प्रधानमंत्री के निर्णयों से ही तय होना है। इसने भारतीय राजनीति की कार्यशैली में एक बड़ा बदलाव ला दिया था।

ऐसा ही एक निर्णय महज तीन साल के अंदर ही, जब कोविड-19 की महामारी तेजी से फैल रही थी, प्रधानमंत्री ने देश के नाम संबोधन किया और पूरे देश में लाॅकडाउन लगा दिया। इसके साथ ही प्रधानमंत्री एक सर्वोच्च सरकार की तरह खुद को स्थापित का चुके थे। बाकी आम जन ही नहीं, उसके ऊपर बैठे मध्यवर्ती लोगों को भी उनका निर्णय सुनना था और उसे मानने के लिए विवश होना था। कल्ट का निर्माण राजसी वैभव हासिल हो चुका था और निर्माण में नीचे तबाही का मंजर चारों तरफ बिखरा हुआ था।

आमतौर पर भारत में हुए नोटबंदी को कालाधन से उलझा दिया जाता है। जिस समय नोटबंदी की गई, उसके उद्देश्य को लेकर खुद केंद्र की भाजपा सरकार के मंत्री तक स्पष्ट नहीं थे और कई तरह के बयान दे रहे थे। कुछ इसे कालाधन से, कुछ आतंकवाद से, कुछ सट्टेबाज और सटोरियों आदि से जोड़ रहे थे।

मुद्रा बाजार और परिचालन से दो नोटों के अचानक चलन से बाहर कर देने से लोग जगह-जगह फंसे हुए थे। बस स्टैंड, हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशनों से लेकर अस्पतालों तक भुगतान की समस्या ने लोगों को उलझा दिया था। मजदूरों की मजदूरी फंस गई और खेतों में उग रहे पौधों के खाद-पानी खरीदने, भुगतान करने और पाने की समस्या से किसान त्रस्त हो रहे थे। व्यापारी अफरा-तफरी में इधर उधर भाग रहे थे।

अचानक लाये गये 2000 के गुलाबी नोटों की अदला बदली और एटीएम से निकालने की सीमा की वजह से आम लोगों के लिए जीना ही चुनौती बन गया था।

इसका सीधा असर उद्योगों की गतिविधि पर पड़ा। पहले से धीमी पड़ी हुई आर्थिक वृद्धि दर 2 प्रतिशत से अधिक गिरी। महज महीने भर के अंदर 15 लाख लोग रोजगार से बाहर हो गये। उस समय सीएमआईई की रिपोर्ट के अनुसार 2016-17 में रोजगार की संख्या लगभग 43.97 करोड़ थी जो 2017-18 में घटकर 42.61 करोड़ रह गई।

नकद पर आधारित खेती पर गहरा असर पड़ा। उड़ीसा, बिहार, उत्तराखंड, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में कुल खेती के क्षेत्रफल में 2015-16 से 2017-18 की समयावधि में गिरावट देखी जा सकती है। भोजन पर होने वाले खर्च तेजी से कम हुए। 2017-18 के आंकड़े यह दिखाते हैं कि कुल रोजगार की संख्या में तीव्र गिरावट है।

इसके कुछ समय बाद ही कोविड-19 महामारी में किया गया लाॅकडाउन इसे और भी भयावह बनाने की ओर ले गया।

नोटबंदी और उसके बाद लाॅकडाउन का सीधा असर खेती पर निर्भर आबादी में हुई वृद्धि में देखा जा सकता है। यह दुनिया की विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की मौलिक प्रकृति के उलट गति थी। इसे मूलतः अर्थव्यवस्था का सामंतीकरण कहा जाता है।

भारत में इस काम को पहले अंग्रेजों ने अंजाम दिया था। भारत की मैन्युफैक्चरिंग केंद्रों को तबाह कर शहरी आबादी को गांव में जाने के लिए मजबूर किया और एक नियंतित्र शहरी उत्पादन व्यवस्था को जन्म दिया। इसी तरह उसने खेती को भी अपने हितों के साथ नियंत्रित किया। इसका सीधा नतीजा हम गांवों में अकाल और भुखमरी से होने वाली मौतों में देखते हैं और चंद शहरों में बेहद धीमी गति से चल रही उद्योगिक गतिविधियों को देखते हैं जिसमें मजदूरों को रोजगार देने और उचित मजदूरी और आवास तक देने की क्षमता नहीं थी।

नोटबंदी ने बडे़ पैमाने पर डिजिटलाइजेशन को बढ़ावा दिया और इससे जुड़े उद्यमों को एकदम से उछाल पर ला खड़ा किया। अनौपचारिक आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाया। मुद्रा से संबंधित बाजार और रीयल स्टेट को अग्रिम कतार में ला खड़ा किया।इसका सीधा नतीजा काले धन का बाजार फिर से खड़ा हुआ और बैंक डिफाल्टर्स की संख्या में तेज वृद्धि हुई।

इस सबके साथ राजनीति का गहरा रिश्ता बना रहा। और, इसका सीधा फायदा भाजपा को मिला। 2017 में विधानसभा चुनावों भाजपा और उसकी सहयोगी गठबंधन को 7 राज्यों में सफलता मिली। कुछ राज्यों में खरीद-फरोख्त से इनकी सरकार बना ली गई।

नोटबंदी और उसके बाद के समय में लिये गये निर्णय एक दूसरे के साथ जुड़े हुए दिखते हैं। इन निर्णयों का नतीजा हम केंद्र और राज्य की सरकार निर्माण में भाजपा का दबदबा बढ़ता जाता है। भाजपा मोदी को और मोदी खुद को, मीडिया और उसकी व्यवस्था के साथ कदम बढ़ाते हुए एक ईश्वरी रूप में पेश किये जाते हैं।

मुद्रा की व्यवस्था पर सीधा नियंत्रण कायम किया जाता है और चंद उद्योगपतियों को तेजी से बढ़ावा दिया जाता है। संगठित क्षेत्र की उद्योगिक संरचना क्षरित होते हुए दिखती है, वहीं अनौपचारिक और सेवा क्षेत्र में तेज वृद्धि को देखा जा सकता है। शहर से आबादी गांव की ओर बढ़ती है जिससे न सिर्फ खेतों पर दबाव बढ़ता है, ग्रामीण जीवन भी प्रभावित होता है। शहरों से आबादी को भगाने के लिए बड़े पैमाने पर बुलडोजर नीति अपनाई जाती है जो कोरोना काल के दौरान भी जारी रहती है और बाद के समय में और भी यह भयावह हो गया।

मजदूरों के न्यूनतम अधिकार बड़े पैमाने छीने गये और उनकी वास्तविक आय घोषित किये गये न्यूनतम मजदूरी से काफी नीचे चली गई। संगठित होने का अधिकार तक या तो उसे कम कर दिया गया या उसे खत्म कर दिया गया। एक तबाह हो रही अर्थव्यवस्था में मोदी ने पांच किलों अनाज की गारंटी स्कीम जारी की।

सामंती मूल्यों से भरे भगवा ब्रिग्रेड के कार्यकर्ताओं ने सनातन के उद्घोष को और हिंसक बना दिया। जाति, वर्ण, धर्म, शुचिता, सेवा, पैरपूजन जैसे शब्द आम होते चले गये और उतने ही ग्रहणीय भी हो गये। बाबाओं का साम्राज्य गांव से लेकर बंगलौर जैसे शहरों तक फैलता चला गया।

दरअसल, नोटबंदी आरएसएस और भाजपा की राजनीतिक आकांक्षाओं का ही परिणाम था, यह उनके राजनीति-अर्थशास्त्र के दर्शन की जमीनी सच्चाई थी। इससे आरएसएस देश का सबसे बड़ा संगठन, भाजपा देश की सबसे धनी पार्टी और अडानी-अंबानी, बाबा रामदेव, रामरहीम जैसे समूहों का उत्थान हुआ।

दूसरी ओर बेरोजगारी से जूझते युवा, आवास की तलाश में तबाह होते कामगार, प्रवास-अप्रवास की चक्रीय गति में फंसे करोड़ों रोजगार की तलाश करते लोग, लालफीताशाही में फंसे छोटे उद्यमी और व्यापारी और तबाही के लिए अभिशप्त किसान पैदा हुए हैं। भूख, भय, अस्थिरता, आशंका, असुरक्षा जैसे वे तत्व हैं जो भारत के हर कोने में फैले हुए हैं। आत्महत्या, मानसिक अस्थिरता, हिंसा के जघन्य रूप भारत के हर कोने में फैल गये हैं।

व्यवस्था के नाम पर आरएसएस और उनके सहयोगी संगठन सनातन धर्म की वकालत कर रहे हैं और वर्णव्यवस्था को चलाये रखने के लिए आये दिन हमलावर हो रहे हैं। हमें यहां एक बार याद कर लेना होगा कि एक झटके से सिर्फ नोटबंदी ही नहीं लाया गया, लाॅकडाउन भी लाया गया।

यह कोई अपरिपक्व निर्णय नहीं था, यह एक परिपक्व निर्णय था जिसके नतीजे तात्कालिक और दूरगामी दोनों ही सामने आते जा रहे हैं और आगे आएंगे। यह सब कुछ भारत जैसे देश के लिए भयावह है और आम नागरिक के लिए एक चुनौती भी है।

इसलिए जरूरी है कि चरम प्रतिक्रियावाद की इस फासीवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र को ध्यान से देखा और परखा जाए और इसे समझा जाए। समाज की गति कई बार पीछे जाती हुई दिखती है। दरअसल, वह पीछे की ओर नहीं वर्तमान को सड़ांध में ठेलती हैं जिससे एक बेहतर जिंदगी जीने का सपना खत्म हो जाए और संड़ांध पर पलने वाले बने रहें। इस संड़ांध से अपने समाज को बाहर ले आने के लिए जिस तरह के प्रयास की जरूरत हैं उसमें नीहित जोखिम से इंकार नहीं किया जा सकता। अभिव्यक्ति के खतरे तो उठाने ही होंगे।

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